ये हैं वो लखनऊ के मशहूर पर्यटन स्थल, जो करते हैं पर्यटकों को आकर्षित

1785

‘मुस्कुराइए जनाब आप लखनऊ में हैं’ यह सुनकर हर किसी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खुद-ब-खुद आ जाती है। वैसे तो नवाबों का शहर लखनऊ अदब और तहज़ीब के लिए भी जाना जाता है। यहां की रोचक बात एक यह भी है कि यहां चिकन खाने के साथ-साथ लोग चिकन पहनते भी हैं। चलिए आज हम आपको लखनऊ के कुछ प्रसिद्ध और ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल के बारे में बताते हैं जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है…..

इमामबाड़ा

पुराने लखनऊ के प्रसिद्ध इमामबाड़े का निर्माण आसफउद्दौला ने 1784 में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत करवाया था। यह विशाल गुम्बदनुमा हॉल जिसकी लंबाई 50 मीटर और ऊंचाई 15 मीटर है। इसके अलावा यहां एक अनोखी भूल भुलैया भी है जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बनती है।

घंटाघर

लखनऊ का घंटाघर भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है। इसे 1887 ई. में बनवाया गया था। इसे ब्रिटिश वास्तुकला के सबसे बेहतरीन नमूनों में भी माना जाता है। इसकी ऊंचाई 221 फीट है और इसका निर्माण नवाब नसीरूद्दीन हैदर ने सर जार्ज कूपर के आगमन पर करवाया था।

रूमी दरवाजा

बड़ा इमामबाड़ा की तरह ही रूमी दरवाजे का निर्माण भी अकाल राहत प्रोजेक्ट के अन्तर्गत किया गया है। इसका निर्माण नवाब आसफउद्दौला ने 1783 ई. में अकाल के दौरान करवाया था ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। इस दरवाजे को तुर्किश गेटवे भी कहा जाता है। रूमी दरवाजा कांस्टेनटिनोपल के दरवाजों के समान दिखाई देता है। इस इमारत कि ऊंचाई 60 फीट है।

हुसैनाबाद (छोटा) इमामबाड़ा

मोहम्मद अली शाह ने हुसैनाबाद इमामबाड़ा की रचना की थी जिसका निर्माण 1837 ई. में हुआ था। इसे छोटा इमामबाड़ा भी कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि मोहम्मद अली शाह को यहीं दफनाया भी गया था। इस इमामबाड़े की खास बात यह भी है कि इसमें मोहम्मद की बेटी और उसके पति का मकबरा भी बना हुआ है। मुख्य इमामबाड़े की चोटी पर सुनहरा गुम्बद है जिसे अली शाह और उसकी मां का मकबरा समझा जाता है। मकबरे के विपरीत दिशा में सतखंड नामक अधूरा घंटाघर है जिसे 1840 में अली शाह की मृत्यु के बाद इसका निर्माण रोक दिया गया था। उस समय 67 मीटर ऊंचे इस घंटाघर की चार मंजिल ही बनी थी। मोहर्रम के दिन इस इमामबाड़े की खूबसूरत सजावट की जाती है।

जामी मस्जिद

हुसैनाबाद इमामबाड़े के पश्चिम दिशा में जामी मस्जिद स्थित है जिसका निर्माण मोहम्मद शाह ने शुरू किया था लेकिन 1840 ई. में उनकी मृत्यु हो गई उसके बाद निर्माणकार्य उनकी पत्नी ने पूरा करवाया। जामा मस्जिद इसलिए भी मशहूर है क्योंकि यह लखनऊ की सबसे बड़ी मस्जिद है।

बनारसी बाग

वैसे तो यह एक चिड़ियाघर है लेकिन स्थानीय लोग इसे बनारसी बाग कहते हैं। इस बाग की खासियत यह है कि यहां के हरियाली वाले वातावरण में जानवरों की कुछ प्रजातियों को छोटे पिंजरों में रखा गया है। चिडियाघर में एक सरकारी संग्रहालय भी है जहां मथुरा से लाई गई पत्थरों की मूर्तियों का संग्रह और रानी विक्टोरिया की मूर्ति माजूद है। संग्रहालय में मिस्र की एक ममी भी रखी हुई है जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

पिक्चर गैलरी

छोटे इमामबाड़े के घंटाघर के पास 19वीं शताब्दी में बनी यह पिक्चर गैलरी है। यह ऐसी जगह है यहां लखनऊ के अधिकतर नवाबों की तस्वीरें देखी जा सकती हैं।

मोती महल

गोमती नदी की सीमा पर मौजूद तीन इमारतों में मोती महल सबसे प्रमुख है। मोती महल इमारत को सआदत अली खां ने बनवाया था। मोती महल के अलावा मुबारक मंजिल और शाह मंजिल दो अन्य इमारतें हैं। बालकनी से जानवरों की लड़ाई और उड़ते पक्षियों का नज़ारा लेने हेतु नवाबों के लिए इन इमारतों को बनवाया गया था।